भागलपुर
शिल्प संगित, नृत्य एवं नाट्य महाविद्यालय

ललित कला एवं शिल्प कला के क्षेत्र में बिहार के पिछड़ेपन को समाप्त करने तथा इस विशेष शिक्षा के विश्व विद्यालय की शिक्षा व्यवस्था के अन्तर्गत व्यापक जनहित में समाविष्ट कराने के उद्येश्य से कला केन्द्र, भागलपुर की स्थापना 24 अगस्त 1954 को की गई थी।
ललित कला एवं शिल्प शिक्षा संबंधी कला केन्द्र, भागलपुर परिकल्पित योजना को जन-जीवन के लिए उपयोग मानकर स्थापना के साथ-साथ ततकालिन महामहिम राज्यपाल और गाँधी दर्शन के प्रख्यात चिन्तक श्री रंगनाथ रामचन्द्र दिवाकर का और पुराने बिहार विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति श्री श्यामनन्दन सहाय जी का प्रोत्साहन और आर्शिवाद इसे मिला। पुराने बिहार विश्वविद्यालय में इस जनापयोगी शिक्षा व्यवस्था के लिए विश्वभारती विश्वविद्यालय पैटर्न पर ’’ललित कला एवं शिल्प’’ नामक कई फेकल्टी की स्थापना के लिए पहल की गई।नई फेकल्टी की स्थापना के लिए कला केन्द्र,भागलपुर को तत्संबंधी शिक्षा संस्थान के रूप में अप्रत्यक्ष मान्यता देने की आवश्यकता समझी गई। तकनिकी आवश्यक-कला को देखते हुए दूरदर्शी कुलपति महोदय ने कलाकेन्द्र,भागलपुर को टोकन अनुदान देकर समस्या का समाधान आसानी से कर दिया। कला केन्द्र,भागलपुर को अनुदान देने का क्रम उसी समय से चला आ रहा है।
पुराने बिहार विश्वविद्यालय में 1957-58 में ’’ललित कला एवं शिल्प फकेल्टी’’ की विधिवत स्थापनी की गई। उस समय के विश्वविद्यालय निरीक्षक डॉ विमान बिहारी मजुमदार के नेतृत्व में विश्वभारती (शान्तीनिकेतन) विश्वविद्यालय के ललित कला विशेषज्ञ प्रोफेसर श्री शैलेजा रंजन मजुमदार के सहयोग से निरीक्षण-प्रक्रिया पूरी कराकर बिहार विश्व विद्यालय ने नियमानुसार कला केन्द्र, भागलपुर को दो-दो वर्षों के क्रम में चार वर्षो का विश्वविद्यालय द्वारा प्रस्तुत सिलेवस के अध्ययन-अध्यापन के लिए सम्बन्धन प्रदान किया और विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित डिप्लोमा पार्ट-1 (दो वर्ष पुरा होने पर) और डिप्लोमा पार्ट-2 (दो सत्र पुरा होने पर) की परीक्षाओं में सम्मिलत होने के लिए कला केन्द्र के छात्रों को अधिकृत किया। उस समय विश्वभारती विश्ववि़द्यालय में डिप्लोमा केर्स ही चल रहा था। सिलेवस के निर्माण में राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के शिल्प मनीषी शिल्पाचार्य नन्दलाल वोस ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस तरह कला केन्द्र,भागलपुर 1958-59 से ही विश्वविद्यालय द्वारा विधिवत् सम्बघता प्राप्त ललितकला एवं शिल्प महाविद्यालय है जो बिहार की विश्वविद्यालय शिक्षा व्यवस्था में पहला और अकेला महाविद्यालय है। 1958-59 से ही कला केन्द्र, भागलपुर के छात्र विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित परीक्षा मे सम्मिलत होते आ रहे है।
महामहिम राज्यपाल श्री रंगनाथ रामचन्द्र दिवाकर के बाद जब महान शिक्षाविद डॉ जाकिर हुसैन बिहार के महामहिम राज्यपाल होकर आये तो उन्होने कला सेवा केन्द्र,भागलपुर का निरीक्षण किया और विश्वभारती विश्वविद्यालय पैटर्न पर कला केन्द्र में दी जा रही है शिक्षा व्यवस्था के प्रति वे विशेष रूप से प्रभावित हुए। 1960 में जब भागलपुर विश्वविद्यालय की स्थापना हुई तो उनके परामर्श पर भागलपुर विश्वविद्यालय के साथ कला केन्द्र,भागलपुर युक्त हो गया। उपराष्ट्रपति पद से महामान्य जाकिर साहेब ने 1962 में भारत सरकार के तत्कालिन संस्कृतिक शिक्षा विषयक मंत्री मान्य हुमायु कबीर की सहायता से कला केन्द्र,भागलपुर में विश्वकवि रविन्द्र नाथ ठाकुर के शताब्दी-समारोह के अवसर पर मुक्त अंगन रवीन्द्र रंग मंच निर्माण कराने में महत्वपूर्ण अंश ग्रहण किया। भारत के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति पद से बुनियाद तामिल के पक्षधर महामान्य डॉ जाकिर हुसैन ने कला केन्द्र के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को भी अपनी असुशंसा भेजी थी। फलस्वरूप भागलपुर विश्वविद्यालय में डिग्री स्तर की पढ़ाई हेतु सम्बधता के लिए कार्यवाही शुरू की जा सकती थी।
1977 में तत्कालिन स्थानापन्न कुलपति डॉ नर्मदेश्वर झा जी ने कला केन्द्र,भागलपुर के डिग्री स्तर में प्रोन्नत करने के लिए राज्य सरकार की अनुशंसा की थी।
1981-82 सत्र से कला केन्द्र,भागलपुर को डिग्री स्तर की शिक्षा व्यवस्था के लिए राज्य सरकार ने सम्बद्धता प्रदान की है। सम्बन्धोपरान्त राज्य सरकार ने अपने पत्रांक के/ए-05/शि0-72 दिनांक 12 फरवरी 1982 में कला केन्द्र,भागलपुर के लिए 18 शिक्षक और 11 शिक्षकेत्तर कर्मचारियों के पदों को सृजित कर अपनी स्वीकृति प्रदान की है। सरकार द्वारा सृजित और स्वीकृत पदो ंके लिए वजट विश्वविद्यालय के माध्यम से राज्य सरकार के सक्षम स्वीकृति हेतु विचाराधिन पड़ा हुआ है।

प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी की नई निती के अनुसार ललित कला एवं शिल्प शिक्षा अध्यात्मिक और भौतिक दोनों ही दृष्टियों से समाजोपयोगी शिक्षा है जो एक और तो शुद्ध और स्वस्थ्य जीवन के लिए मानसिक संतुलन बनाये रखने की प्रेरणा देती है दूसरी ओर स्वतंत्र रोजगार के लिए मानसिकता के भी प्रबुद्ध बनाती है।
कला केन्द्र,भागलपुर की शिक्षा व्यवस्था की उपयोगिता के सम्बन्ध में कहा जा सकता है कि अबतक जितने भी सेवाओं में अपनी-अपनी दिक्षिता का परिचय दे रहे है। कुछ छात्र स्वनियोजन में लोकप्रियता भी प्राप्त कर रहे है।
विश्व के महान नेत्री, गुट निरपेक्ष राष्ट्रीयों की शशक्त प्रहरी और विश्व शांति की प्रबल उदघाषिका पूर्व प्रधानमंत्री,भारत रत्न श्रीमती इन्दिरा गांधी ने भी कला केन्द्र का निरीक्षण किया था और अपनी शुभकामनायें दी थी।
राज्य और राष्ट्र जिन मनीषियों ने कला केन्द्र,भागलपुर आकर अपना-अपना अर्शीवाद दिया है उन्हें बिहार के राष्ट्र नेता बिहार केसरी डॉ0 श्री कृष्ण सिंह, बिहार विभूति डॉ अनुग्रह नारायण सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री पंडित विनोदानन्द झा, श्री दारोगा राय पूर्व शिक्षा मंत्री श्री बद्री नाथ वर्मा, श्री कुमार गंगा नन्दन सिंह,डॉ राम राय सिंह, पूर्व मंत्री महेन्द्र प्रताप सिंह, उत्तर प्रदेश के पूर्व यशस्वी मुख्यमंत्री डॉ सम्पूर्णानन्दन, अखिल भारतीय हस्त शिल्प बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष श्रीमती कमला देवी, चट्टोपाध्याय हिन्दी साहित्य के उद्भट विद्वान और विधान सभा के पूर्व अध्यक्ष डॉ लक्ष्मीनारायण सिंह, ’’सुधांशु’’, राष्ट्रकवि डॉ रामधारी िंसह दिनकर, अखिल भारतीय समाज कल्याण पार्षद के श्रीमती दुर्गा बाई देश मुख और श्रीमती महेन्द्र कौर, बिहार लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य श्री विश्व मोहन कुमार सिंह, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्राचार्य और पूर्व प्रधानविचार पति एवं विश्वभारती एवं विश्वविद्यालय के उपचार्य सुधी रंजन दास, महाराष्ट्र के पूर्व महामहिम राज्यपाल श्री श्री प्रकाश, पूर्व राज्यपाल शिक्षा मंत्री और वर्तमान मंत्री श्री दिनेश कुमार सिंह, पूर्व शिक्षा आयुक्त सर्व श्री शिव कुमार श्रीवास्तव ओर के0 एन0 अर्द्धनारीश्वन, केलिफोर्निया विश्वविद्यालय के चित्र और मुर्ती शिल्प के प्रोफेसर राय रीव्स एवं बिहार के लोकप्रिय कला शिल्प पद्म श्री उपेन्द्र महारथि आदि प्रमुख है।
बिहार के पूर्व महामहिम राज्यपाल सर्व श्री जगन्नाथ कौशल और डॉ0 ए0 पी0 और किदवई ने भी कला केन्द्र का निरीक्षण कर राज्य सरकार को इसके समुचित विकास के लिए अपनी अनुशंसा दी है।
नगर के बीच कला केन्द्र,भागलपुर के पर्याप्त अपनी जमीन है। केन्द्र सरकार के अनुदान से विशाल रविन्द्र रंग मंच समस्त उपकरणों के साथ निर्मीत है। इससे सटे भागलपुर विश्वविद्यालय की मदद से मुख्य शिल्प विभाग निर्मीत है। राज्य सरकार के अनुदान से तीन कमरों और बरामदे से युक्त भवन है। राज्य सरकार के अनुदान से ही विशान मुख्य भवन निर्णाधीन है जिसमें कलास कार्य के लिए मन सहित 6 बड़े-बड़े कमरे बन चुके है। समय-समय पर प्राप्त अनुदान से निर्माण कार्य चलाया जा रहे है। कम्पाउण्ड में ही अधूरा प्राचार्य निवास निर्मीत है।अकेले कला केन्द्र,भागलपुर की जमीन कीमत 20 लाख से कम नहीं है। कला केन्द्र,भागलपुर वो घाटा अनुदान/अंगीभूत महाविद्यालय बना देने से परिकल्पित योगदान को पुरा करने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से भी अपेक्षित अनुदान मिल सकेगा। ललित कला एवं शिल्प शिक्षा क्षेत्र में बिहार ऐसे पिछड़े और विकासशिल राज्य के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग पूर्व संवेदनशील है।
बेकारी और बेरोजगारी के परिपेक्ष्य में विशेष शिक्षित युवा बेकारें और बेरोजगारों को देखते हुए ललित कला एवं शिल्प शिक्षाकी आवश्यकताओं को नई शिक्षा निती के तहत् ना तो अस्वीकारा जा सकता है औरना अपेक्षित बनाये ही रखा जा सकता है।
बिहार से सटे उत्तर प्रदेश के सभी विद्यालयों के प्रायः सभी महाविद्यालयों ललितकला एवं शिल्प शिक्षा के तहत् चित्र कला विषय में डिग्री स्थल की शिक्षा व्यवस्था तो है ही कई महाविद्यालयों में स्नात्कोत्तर एवं शोध की शिक्षा व्यवस्था भी है। उन्हें विद्यालय अनुदान आयोग से यथेष्ठ अनुदान भी उपलब्ध हो रहे है।

 

कला केन्द्र के प्राचार्यः-
गुरूजी एक महान कलाकार है। यह बहुत ही सुन्दर फाईन आर्ट के शिक्षक है और यह कला केन्द्र भागलपुर का प्राचार्य है। इनका नाम श्री रामलखन सिंह है। इनका जन्म बांका जिला के रजौन प्रखंड में खिड्डी गाॅव में 1955 ई में हुआ है। कला केन्द्र मे यह 1979 से यह छात्र है।

 

 

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